गरीबी और बेरोजगारी
परिचय:
एक सवाल से शुरू करते हैं: क्या हर बेरोजगार व्यक्ति गरीब होता है? और क्या हर गरीब व्यक्ति बेरोजगार?
दोनों का जवाब "नहीं" है, और परीक्षा में इसी "नहीं" पर नंबर मिलते हैं। दिल्ली की किसी निर्माण साइट पर रोज़ मज़दूरी करने वाला बिहार का श्रमिक बेरोजगार नहीं है, फिर भी वह गरीबी के किनारे पर जीता है। दूसरी तरफ़ केरल का एक पोस्ट-ग्रेजुएट सालों से नौकरी खोज रहा है, पर उसका परिवार गरीब नहीं है। गरीबी और बेरोजगारी जुड़ी ज़रूर हैं, पर एक-दूसरे का दूसरा नाम नहीं हैं। यह फ़र्क़ समझ लिया तो इस विषय के ज़्यादातर प्रश्न आसान हो जाते हैं।
इस लेख में आपको मिलेगा:
- गरीबी और बेरोजगारी की सटीक परिभाषाएँ, मापन के तरीक़े और समितियों की तुलना
- दोनों के संबंध का वह विश्लेषण, जो मेन्स और निबंध में काम आता है
- मनरेगा की जगह आए नए VB-G RAM G समेत मौजूदा योजनाओं का मूल्यांकन
- हर सेक्शन में 📌 परीक्षा पॉइंट दिया है। समय कम हो तो पहले वही पढ़ें।
गरीबी क्या है?
गरीबी वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति या परिवार भोजन, आवास, कपड़े, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाता। इसे देखने के दो नज़रिए हैं। पहला आय या उपभोग का: आप महीने में कितना खर्च कर पाते हैं। दूसरा क्षमताओं का, जिसे अमर्त्य सेन ने आगे बढ़ाया: गरीबी सिर्फ़ कम पैसा नहीं, बल्कि पढ़ने, स्वस्थ रहने और सम्मान से जीने के अवसरों का न होना भी है। भारत का MPI इसी दूसरे नज़रिए से निकला है।
📌 परीक्षा पॉइंट: अमर्त्य सेन का "क्षमता दृष्टिकोण" (Capability Approach) मानव विकास सूचकांक और बहुआयामी गरीबी की सैद्धांतिक नींव माना जाता है। मेन्स में "गरीबी केवल आय की कमी नहीं है" वाले तर्क के साथ इसे जोड़ें।
गरीबी के प्रकार
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प्रकार |
अर्थ |
उदाहरण |
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निरपेक्ष गरीबी |
न्यूनतम ज़रूरतों के तय स्तर से नीचे जीना |
गरीबी रेखा से नीचे की आबादी |
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सापेक्ष गरीबी |
दूसरों की तुलना में बहुत नीचे होना |
राज्य की सबसे निचली 10% आबादी बनाम सबसे ऊपरी 10% |
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दीर्घकालिक (Chronic) |
पीढ़ियों तक चलने वाली गरीबी |
बिहार के मुसहर जैसे अति-वंचित समुदाय |
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क्षणिक (Transient) |
झटके के बाद अस्थायी गिरावट |
फसल बर्बाद होने या नौकरी छूटने के बाद का परिवार |
इनमें सबसे ज़्यादा ध्यान देने लायक़ क्षणिक गरीबी है। कोई परिवार गरीबी रेखा के ठीक ऊपर है और एक बीमारी या एक सूखा उसे नीचे धकेल देता है। इसलिए नीतियाँ सिर्फ़ "आज के गरीब" नहीं, "कल गिर सकने वाले" लोगों के लिए भी बननी चाहिए।
गरीबी का दुष्चक्र
अर्थशास्त्री रैगनर नर्क्स ने कहा था कि देश गरीब है क्योंकि वह गरीब है। चक्र इस तरह चलता है: कम आय → कम बचत → कम निवेश → कम उत्पादकता → फिर कम आय। एक छोटा किसान इसका उदाहरण है। आय कम है तो बेहतर बीज और सिंचाई में निवेश नहीं कर पाता, पैदावार कम रहती है, और अगले साल आय फिर कम रहती है।
📌 परीक्षा पॉइंट: "गरीबी का दुष्चक्र" नर्क्स से जुड़ा है। चक्र तोड़ने के तीन बिंदु याद रखें: आय बढ़ाना (रोज़गार), निवेश बढ़ाना (ऋण/बुनियादी ढाँचा) और मानव पूँजी में सुधार (शिक्षा-स्वास्थ्य)।
मात्रक एवं मापन (Units & Measurements) Notes & PYQ.
गरीबी का मापन
गरीबी रेखा वह न्यूनतम
उपभोग-व्यय है जिससे
नीचे व्यक्ति को गरीब माना
जाता है। गरीबी अनुपात
(Head Count Ratio) = (गरीबी
रेखा से नीचे की
आबादी ÷ कुल आबादी) × 100।
भारत में इस रेखा
को तय करने के
तरीक़े समय के साथ
बदले हैं, और परीक्षा
में यही क्रम पूछा
जाता है।
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समिति / वर्ष |
आधार |
मुख्य बात |
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अलघ टास्क फ़ोर्स (1979) |
कैलोरी: ग्रामीण 2400, शहरी 2100 |
कैलोरी-आधारित रेखा की औपचारिक शुरुआत |
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लकड़ावाला (1993) |
वही कैलोरी आधार |
राज्य-वार गरीबी रेखा, राज्यों की कीमतों के हिसाब से |
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तेंदुलकर (2009) |
कैलोरी की जगह उपभोग की टोकरी (भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, कपड़े आदि) |
2011-12 में ग्रामीण ₹816, शहरी ₹1,000 प्रति व्यक्ति/माह; गरीबी 21.9% |
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रंगराजन (2014) |
उपभोग टोकरी + न्यूनतम खाद्य-पोषण और गैर-खाद्य खर्च |
ग्रामीण ₹972, शहरी ₹1,407; गरीबी 29.5% (2011-12) |
तेंदुलकर
रेखा को याद रखने
का आसान तरीक़ा है
उसकी दैनिक गणना: ₹816 का
मतलब ग्रामीण इलाके में करीब
₹27 रोज़ और ₹1,000 का मतलब शहर
में करीब ₹33 रोज़। इतने कम
आँकड़े पर देश में
तीखी बहस हुई, कि
क्या इतने में कोई
इंसान सचमुच भोजन, इलाज
और शिक्षा संभाल सकता
है। इसी आलोचना के
बाद रंगराजन समिति बनी, जिसने
रेखा ऊँची रखी और
गरीबी अनुपात बढ़कर 29.5% आया।
📌 परीक्षा पॉइंट: क्रम
याद रखें: अलघ (1979) → लकड़ावाला
(1993) → तेंदुलकर (2009)
→ रंगराजन (2014)। तेंदुलकर ने
कैलोरी छोड़कर उपभोग की
टोकरी अपनाई और 2004-05 के
लिए गरीबी 37.2% बताई; 2011-12 के लिए 21.9%।
जाल: "कैलोरी 2400/2100" की शुरुआत अलघ
टास्क फ़ोर्स से है,
लकड़ावाला ने इसे जारी
रखते हुए राज्य-वार
कीमतें जोड़ीं।
2011-12 के
बाद लंबे समय तक
कोई आधिकारिक गरीबी आँकड़ा नहीं
आया। इस खालीपन को
भरने के लिए अब
तीन स्रोत चलते हैं:
नीति आयोग का बहुआयामी
गरीबी सूचकांक, घरेलू उपभोग व्यय
सर्वेक्षण (HCES) और विश्व बैंक
के अनुमान। तीनों अलग चीज़ें
मापते हैं, इसलिए उनके
आँकड़े आपस में नहीं
मिलते। यह अगले सेक्शन
का मुख्य बिंदु है।
बहुआयामी गरीबी (MPI) और विश्व बैंक के आँकड़े
नीति आयोग का राष्ट्रीय MPI
वैश्विक MPI 2010 में UNDP और ऑक्सफ़ोर्ड के OPHI ने शुरू किया था। भारत का राष्ट्रीय MPI नीति आयोग ने नवंबर 2021 में पहली बार जारी किया। यह आय नहीं, एक साथ मौजूद वंचनाओं को गिनता है: तीन बराबर भार वाले आयाम (स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर) और उनके 12 संकेतक। जिस घर का वंचना-स्कोर एक-तिहाई या उससे अधिक हो, वह MPI के हिसाब से गरीब माना जाता है।
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आयाम |
संकेतक |
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स्वास्थ्य |
पोषण, बाल-किशोर मृत्यु दर, मातृ स्वास्थ्य |
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शिक्षा |
स्कूली शिक्षा के वर्ष, स्कूल में उपस्थिति |
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जीवन स्तर |
खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, संपत्ति, बैंक खाता |
राष्ट्रीय MPI वैश्विक के 10 संकेतकों में मातृ स्वास्थ्य और बैंक खाते को जोड़कर 12 बनता है। दूसरी रिपोर्ट (2023, NFHS-5 पर आधारित) के मुख्य निष्कर्ष:
- बहुआयामी गरीबी 2015-16 के 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हुई; लगभग 13.5 करोड़ लोग इससे बाहर आए
- ग्रामीण गरीबी 32.59% से 19.28%, शहरी 8.65% से 5.27%
- MPI मान 0.117 से 0.066, और गरीबी की तीव्रता 47% से 44%
- सबसे तेज़ गिरावट उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में; अकेले उत्तर प्रदेश में करीब 3.43 करोड़ लोग बाहर आए
- रिपोर्ट 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और 707 ज़िलों को कवर करती है
स्तर का फ़र्क़ अब भी बड़ा है। NFHS-5 के आँकड़ों में बिहार सबसे ऊपर (करीब एक-तिहाई आबादी बहुआयामी गरीब) था, जबकि केरल सबसे नीचे (एक प्रतिशत से भी कम)। यानी गिरावट तेज़ बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में रही, पर शुरुआती स्तर इतना ऊँचा था कि वे अब भी सूची में ऊपर हैं।
📌 परीक्षा पॉइंट: राष्ट्रीय MPI: 3 आयाम, 12 संकेतक, गरीब होने की सीमा 33.33% (1/3) वंचना-स्कोर। MPI = गरीबी का अनुपात (H) × गरीबी की तीव्रता (A)। नीति आयोग इसका नोडल संस्थान है और यह SDG लक्ष्य 1.2 से जुड़ा है।
विश्व बैंक का अनुमान
विश्व बैंक ने अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा को $2.15 (2017 PPP) से बढ़ाकर $3 प्रतिदिन (2021 PPP) किया। इस नई रेखा पर भारत में अत्यधिक गरीबी 2011-12 के 27.1% से घटकर 2022-23 में 5.3% रही, यानी करीब 7.5 करोड़ लोग। $3.65 की रेखा पर यह 61.8% से घटकर 28.1% हुई, और निम्न-मध्यम आय वाले देशों की $4.20 की रेखा पर 2022-23 में 23.9% रही। उपभोग-आधारित गिनी सूचकांक 28.8 से सुधरकर 25.5 पर आया।
यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है। सुधार का एक हिस्सा सर्वेक्षण की पद्धति बदलने से भी आया है, जैसे MMRP (संशोधित मिश्रित संदर्भ अवधि) अपनाने से 2011-12 का अनुमान भी नीचे आया। मुफ़्त और रियायती अनाज जैसे हस्तांतरणों ने भी उपभोग को सहारा दिया। इसलिए "गरीबी गिरी" कहते समय हमेशा लिखें: किस रेखा पर, किस वर्ष, किस स्रोत के अनुसार।
📌 परीक्षा पॉइंट: गरीबी
रेखा आधारित (आय/उपभोग) और
MPI (वंचना) अलग-अलग चीज़ें
मापते हैं, इसलिए अलग
संख्याएँ आती हैं। उत्तर
में दोनों का ज़िक्र
करने से "संतुलित विश्लेषण" के अंक मिलते
हैं।
भारतीय राजव्यवस्था का महत्वपूर्ण टॉपिक: संघीय प्रणाली
बेरोजगारी क्या है? अर्थ और मापन
बेरोजगार वह है जो काम करने में सक्षम है, प्रचलित मज़दूरी पर काम करना चाहता है और सक्रिय रूप से काम खोज रहा है, फिर भी उसे काम नहीं मिल रहा। इस परिभाषा में तीन शर्तें हैं और तीनों ज़रूरी हैं। पढ़ाई कर रहा छात्र, घर सँभालने वाली गृहिणी या सेवानिवृत्त व्यक्ति काम नहीं कर रहे, पर वे बेरोजगार नहीं गिने जाते, क्योंकि वे काम खोज ही नहीं रहे।
मापन
के तीन सूचक हैं,
और इन्हें एक छोटे
उदाहरण से समझना सबसे
आसान है। मान लीजिए
15 साल से ऊपर के
100 लोगों में 55 काम कर
रहे हैं या काम
खोज रहे हैं, इनमें
52 के पास काम है
और 3 के पास नहीं।
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सूचक |
सूत्र |
उदाहरण में |
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श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) |
श्रम बल ÷ कुल जनसंख्या × 100 |
55 ÷ 100 = 55% |
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श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) |
कार्यरत ÷ कुल जनसंख्या × 100 |
52 ÷ 100 = 52% |
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बेरोजगारी दर (UR) |
बेरोजगार ÷ श्रम बल × 100 |
3 ÷ 55 = 5.45% |
ध्यान दें कि बेरोजगारी दर का हर श्रम बल है, कुल जनसंख्या नहीं। परीक्षा में यही चूक सबसे ज़्यादा होती है।
📌 परीक्षा पॉइंट: श्रम बल = कार्यरत + बेरोजगार (काम खोजने वाले)। UR = बेरोजगार ÷ श्रम बल। "कुल जनसंख्या" से भाग देने वाला विकल्प लगभग हमेशा ग़लत उत्तर होता है।
भारत में आँकड़े कौन देता है: PLFS
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO, MoSPI) कराता है। यह 2017-18 में शुरू हुआ और पाँच-वर्षीय NSSO रोजगार सर्वेक्षणों की जगह आया। 2025 से इसका मासिक बुलेटिन भी आने लगा है। इसमें रोज़गार की स्थिति तय करने के तीन तरीक़े चलते हैं, और यही सबसे ज़्यादा उलझाते हैं।
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तरीक़ा |
संदर्भ अवधि |
किसे "कार्यरत" माना जाता है |
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सामान्य स्थिति (UPSS) |
पिछले 365 दिन |
जिसने मुख्य या सहायक रूप से पूरे साल में काम किया |
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वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (CWS) |
पिछले 7 दिन |
जिसने हफ़्ते में कम से कम एक घंटा काम किया |
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वर्तमान दैनिक स्थिति (CDS) |
हर दिन की स्थिति |
दिन-वार काम के आधार पर |
उदाहरण
से देखें। एक किसान
बुवाई और कटाई में
महीनों काम करता है,
बाक़ी समय खाली रहता
है। सालाना UPSS में वह "कार्यरत"
दिखेगा। पर किसी ख़ाली
हफ़्ते में CWS उसे "बेरोजगार" गिन लेगा। इसीलिए
CWS की बेरोजगारी दर आम तौर
पर UPSS से ज़्यादा आती
है, और यही अगले
सेक्शन की गुत्थी सुलझाता
है।
📌 परीक्षा पॉइंट: UPSS = 365 दिन,
CWS = 7 दिन, CDS = दैनिक। CWS में बेरोजगारी दर
UPSS से ज़्यादा आती है। CDS में
"आधा दिन" और "पूरा दिन" काम
की अवधारणा आती है।
पंचवर्षीय योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका.
बेरोजगारी के प्रकार
भारत में बेरोजगारी की
सबसे बड़ी समस्या वह
नहीं है जो टीवी
पर दिखती है, यानी
"नौकरी नहीं मिल रही"। बड़ी समस्या
यह है कि बहुत
से लोग काम में
लगे हैं, पर उनकी
उत्पादकता या आय बहुत
कम है। इसीलिए नीचे
के प्रकारों में अल्प-रोजगार
और प्रच्छन्न बेरोजगारी पर ख़ास नज़र
रखें।
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प्रकार |
अर्थ |
भारत का उदाहरण |
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प्रच्छन्न (Disguised) |
ज़रूरत से ज़्यादा लोग एक ही काम में लगे; कुछ को हटाने पर भी उत्पादन नहीं घटता (सीमांत उत्पादकता शून्य) |
उत्तर प्रदेश-बिहार की छोटी जोत, जहाँ दो लोगों के काम में पाँच सदस्य लगे हैं |
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मौसमी |
साल के कुछ महीनों में ही काम |
उत्तर प्रदेश-महाराष्ट्र की चीनी मिलों के मज़दूर; हिमाचल-उत्तराखंड में पर्यटन के सीज़न के बाहर काम |
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संरचनात्मक |
अर्थव्यवस्था की संरचना बदलने से कौशल बेमेल हो जाना |
बनारसी बुनकर, जब पावरलूम और सस्ते आयात आए |
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घर्षणात्मक |
एक नौकरी छोड़ने और दूसरी पाने के बीच का अंतराल |
नई कंपनी में जाने से पहले के दो महीने |
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चक्रीय |
मंदी या आर्थिक झटके से |
2020 के लॉकडाउन में शहरों से लौटते प्रवासी मज़दूर |
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तकनीकी |
मशीन या तकनीक से काम छिनना |
FASTag आने के बाद टोल बूथ पर कम कर्मचारी |
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शिक्षित बेरोजगारी |
पढ़े-लिखे युवाओं को योग्यता के अनुरूप काम न मिलना |
रेलवे या SSC की कुछ हज़ार भर्तियों के लिए लाखों-करोड़ों आवेदन |
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अल्प-रोजगार |
काम है, पर कम घंटे या कम आय वाला |
सब्ज़ी की रेहड़ी लगाता इंजीनियरिंग स्नातक |
रेहड़ी
वाला उदाहरण एक सूक्ष्म
बात दिखाता है। वह
आँकड़ों में "कार्यरत" है। सरकारी बेरोजगारी
दर उसे नहीं पकड़ती,
पर उसकी कमाई उसकी
शिक्षा के अनुरूप नहीं
है। इसीलिए सिर्फ़ बेरोजगारी दर देखकर रोज़गार की सेहत नहीं आँकी जा सकती।
📌 परीक्षा पॉइंट: भारत
में मुख्यतः संरचनात्मक, प्रच्छन्न, मौसमी और अल्प-रोजगार हावी हैं;
चक्रीय बेरोजगारी विकसित देशों की
समस्या अधिक है। घर्षणात्मक
बेरोजगारी स्वैच्छिक मानी जाती है।
प्रच्छन्न और मौसमी में
फ़र्क़: प्रच्छन्न में लोग पूरे
साल लगे दिखते हैं
पर अतिरिक्त होते हैं; मौसमी
में कुछ महीने काम
बिल्कुल नहीं होता।
जानिए प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों के बारे में.
भारत में बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति (2026)
ताज़ा आँकड़े देखने से पहले एक नियम: हर संख्या के साथ चार चीज़ें लिखें, यानी स्रोत, अवधि, आयु वर्ग और स्थिति का तरीक़ा (UPSS या CWS)। इनके बिना "बेरोजगारी दर 5%" और "3.2%" एक-दूसरे के विरोधी लगेंगे, जबकि दोनों सही हैं।
नीति आयोग ने पंचवर्षीय योजना की जगह तीन अलग-अलग समय-सीमा के दस्तावेज़ बनाने शुरू किए:
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संकेतक |
आँकड़ा |
स्रोत और संदर्भ |
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बेरोजगारी दर, अगस्त 2026 |
5.0% |
PLFS मासिक बुलेटिन, 15+ आयु, CWS |
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श्रम बल भागीदारी दर, अगस्त 2026 |
55.6% |
PLFS मासिक बुलेटिन, 15+ आयु, CWS |
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जून 2026 |
कुल 5.5%, शहरी 6.6%, ग्रामीण 5.0%, महिला 5.9% (15 महीने का उच्चतम) |
PLFS मासिक बुलेटिन, CWS |
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वार्षिक बेरोजगारी दर, 2023-24 |
3.2% (ग्रामीण 2.5%, शहरी 5.1%) |
PLFS वार्षिक, 15+ आयु, UPSS |
दोनों
संख्याओं का फ़र्क़ पिछले
सेक्शन की CWS बनाम UPSS वाली
बात से समझिए। मासिक
बुलेटिन सप्ताह की स्थिति
देखता है, वार्षिक रिपोर्ट
पूरे साल की। इसीलिए
एक ही अर्थव्यवस्था दो
अलग दरें दिखाती है।
इन आँकड़ों से तीन बातें निकलती हैं। पहली, शहरी बेरोजगारी ग्रामीण से लगातार ऊँची है, क्योंकि गाँव में लोग खेती या छोटे स्व-रोजगार में खपकर "कार्यरत" दिख जाते हैं। दूसरी, महिला श्रम बल भागीदारी 2017-18 के लगभग 23% से बढ़कर 2023-24 में करीब 42% तक पहुँची है। पर इसमें बड़ा हिस्सा ग्रामीण स्व-रोजगार और अवैतनिक पारिवारिक श्रम का है, यानी आँकड़ा सुधरा है, कमाई उतनी नहीं। तीसरी, युवा (15-29 आयु) बेरोजगारी कुल दर से कहीं ऊँची, लगभग 10% के आसपास, है। इसलिए "भारत में बेरोजगारी कम है" और "युवाओं के लिए नौकरी की कमी है" एक साथ सही हो सकते हैं।
📌 परीक्षा पॉइंट: PLFS के
चार सूचक: LFPR, WPR, UR, और रोज़गार की
स्थिति के आधार पर
श्रमिकों का बँटवारा (स्व-रोजगार, नियमित वेतनभोगी, अनियत
मज़दूर)। स्व-रोजगार
का हिस्सा आधे से
ज़्यादा (लगभग 58%) है और कृषि
अब भी लगभग 46% कार्यबल
को खपाती है। निजी
संस्था CMIE के आँकड़े अलग
तरीक़े से बनते हैं,
इसलिए PLFS से मेल नहीं
खाते।
राष्ट्रीय आय को समझना इतना मुश्किल नहीं है!
गरीबी और बेरोजगारी का अंतर्संबंध
यह वह सेक्शन है जहाँ ज़्यादातर मेन्स उत्तर बनते या बिगड़ते हैं। "बेरोजगारी से गरीबी बढ़ती है" लिखने से आपको औसत अंक मिलते हैं। इसके पीछे का तर्क देने पर अच्छे अंक मिलते हैं।
दुष्चक्र: एक दिशा में नहीं, दोनों दिशाओं में
बेरोजगारी से घर की आय रुकती है। आय रुकने पर पोषण, बच्चों की पढ़ाई और इलाज पर खर्च कटता है। इससे अगली पीढ़ी का मानव पूँजी स्तर गिरता है, यानी कौशल कम, सेहत कमज़ोर। कम कौशल वाले को या तो काम नहीं मिलता या सबसे कम मज़दूरी वाला काम मिलता है, और चक्र दोहराता है। उलटी दिशा में भी यही चलता है। गरीब परिवार के पास प्रशिक्षण, शहर जाने के किराए या नौकरी की तैयारी के लिए पैसा नहीं होता, इसलिए वह बेहतर रोज़गार तक पहुँच ही नहीं पाता।
सरल रूप में: कम आय → कम शिक्षा-पोषण → कम कौशल → बेरोजगारी या कम वेतन का काम → कम आय।
"काम करने वाले गरीब" (Working Poor): सबसे ज़रूरी तर्क
अगर बेरोजगारी ही गरीबी की एकमात्र वजह होती, तो काम पाते ही गरीबी ख़त्म हो जाती। भारत में ऐसा नहीं होता, क्योंकि अधिकांश गरीब बेरोजगार नहीं, निम्न-आय वाले काम में लगे हैं। दिल्ली-एनसीआर की निर्माण साइट का दिहाड़ी मज़दूर, छोटी जोत का किसान, घर पर बीड़ी या अगरबत्ती बनाने वाली महिला, ऑनलाइन डिलीवरी करने वाला गिग वर्कर, ये सब "कार्यरत" हैं। फिर भी न इन्हें सामाजिक सुरक्षा है, न तयशुदा आय। भारत की गरीबी की समस्या अक्सर रोज़गार की मात्रा की नहीं, रोज़गार की गुणवत्ता की है। इसीलिए अनौपचारिक क्षेत्र (जहाँ कार्यबल का बहुत बड़ा हिस्सा है) और उत्पादकता, दोनों नीतियों के केंद्र में आते हैं।
जॉबलेस ग्रोथ बहस
जब जीडीपी बढ़े पर उसके अनुपात में रोज़गार न बढ़ें, तो उसे जॉबलेस ग्रोथ कहते हैं। इसे रोज़गार लोच (Employment Elasticity) से मापा जाता है, यानी विकास में 1% वृद्धि पर रोज़गार कितना बढ़ता है। पूँजी-प्रधान क्षेत्र, जैसे आधुनिक विनिर्माण या सेवाएँ, पैसा और उत्पादन तेज़ी से बढ़ाते हैं पर श्रम कम खपाते हैं। इसका असर यह होता है कि विकास के बावजूद ग़रीब तबके को उसका फ़ायदा देर से और कम पहुँचता है। इसका दूसरा पहलू भी है: समर्थक तर्क देते हैं कि स्व-रोजगार और गिग इकॉनमी में नए अवसर बन रहे हैं, आलोचक कहते हैं कि वे असुरक्षित और कम आय वाले हैं।
हर बेरोजगार गरीब क्यों नहीं होता
केरल का उदाहरण लीजिए। राष्ट्रीय MPI में राज्य लगभग सबसे नीचे है, यानी बहुआयामी गरीबी बहुत कम। फिर भी वहाँ शिक्षित बेरोजगारी ऊँची है और बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं। कारण साफ़ है: अच्छी स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था, विदेश से आती रेमिटेंस और पारिवारिक सहारा बेरोजगारी के झटके को गरीबी बनने से रोक लेते हैं। यही वजह है कि शिक्षित बेरोजगार युवा को गरीब कहना अक्सर ग़लत होता है।
गरीबी के बेरोजगारी के अलावा कारण
जनसंख्या
का दबाव, भूमि का
असमान वितरण, कम कृषि
उत्पादकता, क्षेत्रीय असंतुलन, जातिगत और लैंगिक
भेदभाव, कमज़ोर स्वास्थ्य-शिक्षा
और आपदाएँ भी गरीबी
बनाती हैं। ओडिशा का
कालाहांडी इलाक़ा इसका जाना-पहचाना उदाहरण है,
जहाँ सूखा, सिंचाई की
कमी, कर्ज़ और दूर-दराज़ की भौगोलिक
स्थिति ने दशकों तक
गरीबी बनाए रखी, और
यह सब सीधे "बेरोजगारी"
से नहीं समझाया जा
सकता।
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP)
गरीबी और बेरोजगारी के प्रमुख कारण
कारणों
को तीन खानों में
बाँटकर लिखने से उत्तर
व्यवस्थित दिखता है: जो
सिर्फ़ गरीबी के हैं,
जो सिर्फ़ बेरोजगारी के
हैं, और जो दोनों
के साझा हैं। साझा
कारण ही असल में
दोनों समस्याओं को जोड़ते हैं।
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सिर्फ़ गरीबी के कारण |
सिर्फ़ बेरोजगारी के कारण |
दोनों के साझा कारण |
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भूमि का असमान वितरण, छोटी जोत |
कौशल और उद्योग की माँग का बेमेल |
कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और कम उत्पादकता |
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आपदाएँ, सूखा, कर्ज़ का बोझ |
श्रम-प्रधान विनिर्माण का सीमित विस्तार |
विशाल अनौपचारिक क्षेत्र |
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जातिगत और लैंगिक भेदभाव |
भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा-संस्कृति |
शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में कमी |
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महँगाई की मार, ख़ासकर खाद्य वस्तुओं की |
तकनीक से बदलते काम |
क्षेत्रीय असंतुलन (बिहार, झारखंड जैसे राज्य पीछे) |
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औपनिवेशिक विरासत: हस्तशिल्प उद्योग का पतन |
नई नौकरियों की तुलना में श्रम बल का तेज़ बढ़ना |
जनसंख्या का दबाव |
यहाँ
"कौशल बेमेल" पर रुकिए। भारत
में लाखों स्नातक हर
साल निकलते हैं, फिर
भी उद्योग शिकायत करते
हैं कि उन्हें काम
लायक कर्मचारी नहीं मिलते। यानी
समस्या अकेले नौकरियों की
कमी नहीं, पढ़ाई और
बाज़ार की ज़रूरत के
बीच दूरी भी है।
📌 परीक्षा पॉइंट: कारण
लिखते समय "सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक" का वर्गीकरण रखें
और हर वर्ग में
एक भारतीय उदाहरण जोड़ें।
औपनिवेशिक काल में हस्तशिल्प
और कुटीर उद्योगों का
ह्रास (de-industrialisation)
कृषि पर बोझ बढ़ाने
का ऐतिहासिक कारण माना जाता
है।
रॉलेट एक्ट 1919 – सम्पूर्ण जानकारी (Rowlatt Act in Hindi)
गरीबी और बेरोजगारी के प्रभाव
सबसे साफ़ असर पोषण और स्वास्थ्य पर दिखता है। गरीब घरों में बच्चों का कुपोषण आगे चलकर सीखने की क्षमता और कमाई, दोनों घटाता है। पलायन दूसरा असर है। 2020 के लॉकडाउन में लाखों प्रवासी मज़दूर पैदल या साधन जुटाकर गाँव लौटे, तब दिखा कि रोज़गार छिनने पर शहरों में उनके पास कोई बचाव ही नहीं था। आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी माँग घटाती है, जिससे उद्योग भी धीमे पड़ते हैं। और जनसांख्यिकीय लाभांश का मतलब तभी है जब बढ़ती कामकाजी आबादी को काम मिले। न मिले तो वही आबादी बोझ बन सकती है।
📌 परीक्षा पॉइंट: "जनसांख्यिकीय लाभांश" और "जनसांख्यिकीय बोझ" का फ़र्क़ रोज़गार पर निर्भर करता है।
सरकारी योजनाएँ और कार्यक्रम: क्या काम किया, क्या नहीं
योजनाओं की सूची रटने की जगह हर योजना का "मक़सद और सीमा" एक साथ याद रखें। परीक्षा में आलोचनात्मक मूल्यांकन के अंक इसी से मिलते हैं।
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योजना |
मुख्य बात |
मूल्यांकन |
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VB-G RAM G Act, 2025 (1 जुलाई 2026 से, मनरेगा की जगह) |
ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन की गारंटी (पहले 100), साप्ताहिक मज़दूरी भुगतान, केंद्र-राज्य खर्च 60:40 (11 निर्दिष्ट राज्यों के लिए 90:10), कृषि के चरम मौसम में काम पर रोक का प्रावधान |
दिन बढ़े हैं, पर चिंता यह है कि क्या माँग-आधारित अधिकार वाला चरित्र बचेगा और राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा। पुराने मनरेगा में भी वित्त वर्ष 2025-26 के औसत कार्यदिवस करीब 43 रहे, जो एक दशक में सबसे कम बताए गए |
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PM विकसित भारत रोज़गार योजना (1 अगस्त 2025 से) |
पहली बार EPFO में पंजीकृत कर्मचारी को एक महीने का EPF वेतन (अधिकतम ₹15,000) दो किस्तों में; नियोक्ता को नए कर्मचारी पर ₹1,000 से ₹3,000 प्रति माह; परिव्यय ₹99,446 करोड़, लक्ष्य 3.5 करोड़ रोज़गार |
औपचारिक क्षेत्र को बढ़ावा देती है, पर अनौपचारिक मज़दूर, गिग कर्मी और ग्रामीण महिलाएँ इसके दायरे से बाहर हैं |
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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना |
अधिकार-आधारित सस्ता या मुफ़्त अनाज |
उपभोग को सहारा देती है; आलोचक पोषण की विविधता और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता पर सवाल उठाते हैं |
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दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (2011) |
स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये ग्रामीण महिलाओं को ऋण और आजीविका |
महिला सशक्तीकरण में सफल, पर आय का स्तर क्षेत्र के अनुसार बहुत अलग |
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प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (2015) |
अल्पकालिक प्रशिक्षण और प्रमाणन |
प्रशिक्षण संख्या बड़ी, पर प्रशिक्षण के बाद रोज़गार में बदलाव (प्लेसमेंट) की गुणवत्ता पर सवाल |
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मुद्रा योजना (2015) और PM स्वनिधि (2020) |
सूक्ष्म उद्यमियों और रेहड़ी-पटरी वालों को बिना गारंटी ऋण |
स्व-रोजगार को सहारा, पर ऋण का आकार छोटा होने से उद्यम बड़े नहीं हो पाते |
📌 परीक्षा पॉइंट: तारीख़ें
याद रखें: मनरेगा 2005 में आया और
1 जुलाई 2026 से VB-G RAM G Act, 2025 ने उसकी जगह
ली। यह अधिनियम संख्या
36 (2025) है और इसे ग्रामीण
विकास मंत्रालय लागू करता है।
योजनाओं की वर्तमान स्थिति
में बदलाव हो सकता है,
इसलिए सरकारी पोर्टल या PIB से पुष्टि कर
लें।
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क्विक रिवीज़न नोट्स
आख़िरी दिन के लिए तीन याद रखने के तरीक़े:
- समितियों का क्रम: अ-ल-ते-रं (अलघ, लकड़ावाला, तेंदुलकर, रंगराजन)।
- MPI के आयाम: स्वा-शि-जी (स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर)।
- बेरोजगारी के प्रकार: "प्र-मौ-सं-घ-च-त-शि-अ" (प्रच्छन्न, मौसमी, संरचनात्मक, घर्षणात्मक, चक्रीय, तकनीकी, शिक्षित, अल्प-रोजगार)।
MCQs
प्र.1 |
UPSC प्रीलिम्स
2011
"महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम" का लाभ कौन
ले सकता है?
(a) केवल अनुसूचित जाति और जनजाति
परिवारों के वयस्क सदस्य
(b) गरीबी रेखा से नीचे
(BPL) परिवारों के वयस्क सदस्य
(c) सभी पिछड़े समुदायों के परिवारों के
वयस्क सदस्य
(d) किसी भी परिवार के
वयस्क सदस्य
उत्तर: (d)।
कोई भी वयस्क ग्रामीण
परिवार का सदस्य पात्र
था, यानी योजना BPL या
जाति तक सीमित नहीं
थी।
प्र.2 |
UPSC प्रीलिम्स
2012
ऑक्सफ़ोर्ड गरीबी और मानव विकास
पहल (OPHI) द्वारा UNDP के सहयोग से
विकसित बहुआयामी गरीबी सूचकांक में क्या शामिल
है?
(1) परिवार स्तर पर शिक्षा,
स्वास्थ्य, संपत्ति और सेवाओं की
वंचना
(2) राष्ट्रीय स्तर पर क्रय
शक्ति समता
(3) राष्ट्रीय स्तर पर बजट
घाटा और GDP वृद्धि दर
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)।
उत्तर-कुंजी में विकल्प (a), यानी
केवल कथन 1 सही है। MPI परिवार-स्तर की वंचना
मापता है, राष्ट्रीय आर्थिक
संकेतक नहीं।
प्र.3 |
UPSC प्रीलिम्स
2012
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ग्रामीण गरीबों
के आजीविका विकल्प कैसे सुधारना चाहता
है?
(1) ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या
में नए विनिर्माण उद्योग
और कृषि-व्यवसाय केंद्र
बनाकर
(2) "स्वयं सहायता समूहों" को मज़बूत करके
और कौशल विकास देकर
(3) किसानों को बीज, उर्वरक,
डीज़ल पंप-सेट और
सूक्ष्म सिंचाई उपकरण मुफ़्त देकर
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)।
मिशन समुदाय-आधारित संस्थाओं, स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म उद्यमों
पर ज़ोर देता है,
बड़े उद्योग या मुफ़्त कृषि
सामग्री पर नहीं।
प्र.4 |
UPSC प्रीलिम्स
2012
जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (DRDA) भारत में ग्रामीण
गरीबी घटाने में कैसे मदद
करते हैं?
(1) कुछ निर्दिष्ट पिछड़े क्षेत्रों में पंचायती राज
संस्थाओं की तरह काम
करते हैं
(2) गरीबी और कुपोषण के
कारणों का क्षेत्र-विशेष
वैज्ञानिक अध्ययन कर उपाय तैयार
करते हैं
(3) गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन
के लिए विभिन्न क्षेत्रों
और विभागों में समन्वय सुनिश्चित
करते हैं
(4) गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों के लिए निर्धारित
धन के प्रभावी उपयोग
की निगरानी करते हैं
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)।
DRDA पंचायती राज संस्थाओं की
जगह नहीं लेते और
वैज्ञानिक अध्ययन का काम नहीं
करते; उनकी भूमिका कार्यक्रम
लागू करने, निगरानी और धन-उपयोग
पर नज़र की है।
प्र.5 |
UPSC प्रीलिम्स
2013
प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised
Unemployment) का सामान्यतः अर्थ है:
(a) बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार
रहते हैं
(b) वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध नहीं है
(c) श्रम की सीमांत उत्पादकता
शून्य है
(d) श्रमिकों की उत्पादकता कम
है
उत्तर: (c)।
जब ज़रूरत से ज़्यादा लोग
किसी काम में लगे
हों, तो कुछ को
हटाने पर भी कुल
उत्पादन नहीं घटता, यानी
उनकी सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।
प्र.6 |
UPSC प्रीलिम्स
2018
निरपेक्ष और प्रति व्यक्ति
वास्तविक GNP में वृद्धि उच्चतर
आर्थिक विकास का संकेत नहीं
देती, यदि:
(a) औद्योगिक उत्पादन कृषि उत्पादन के
साथ तालमेल न रख पाए
(b) कृषि उत्पादन औद्योगिक उत्पादन के साथ तालमेल
न रख पाए
(c) गरीबी और बेरोजगारी बढ़ें
(d) आयात निर्यात से तेज़ी से
बढ़ें
उत्तर: (c)।
दृष्टि IAS के प्रश्न संकलन
में यह प्रश्न और
उसका सही विकल्प (c) दिया
है। विकास का मतलब केवल
GNP नहीं, गरीबी और रोज़गार में
सुधार भी है।
प्र.7 |
UPSC प्रीलिम्स
2019
भारत में किसी दिए
गए वर्ष में आधिकारिक
गरीबी रेखाएँ कुछ राज्यों में
दूसरों से ऊँची क्यों
होती हैं?
(a) गरीबी दर राज्य-दर-राज्य अलग है
(b) कीमतों का स्तर राज्य-दर-राज्य अलग
है
(c) राज्य सकल उत्पाद अलग
है
(d) सार्वजनिक वितरण की गुणवत्ता अलग
है
उत्तर: (b)।
गरीबी रेखा वस्तुओं की
एक टोकरी पर आधारित होती
है; टोकरी वही रहती है,
पर कीमतें राज्यों में अलग हैं,
इसलिए रेखा अलग आती
है। गरीबी दर परिणाम है,
रेखा का कारण नहीं।
प्र.8 |
UPSC प्रीलिम्स
2021
भारत में कार्यरत आकस्मिक
(casual) श्रमिकों के बारे में
कथन:
(1) सभी आकस्मिक श्रमिक कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) के पात्र हैं।
(2) सभी आकस्मिक श्रमिक नियमित कार्य-घंटों और ओवरटाइम भुगतान
के पात्र हैं।
(3) सरकार अधिसूचना द्वारा किसी प्रतिष्ठान या
उद्योग को केवल बैंक
खाते से मज़दूरी देने
के लिए बाध्य कर
सकती है। कौन-से
कथन सही हैं?
उत्तर: (b) केवल
2 और
3।
EPF का लाभ हर आकस्मिक
श्रमिक को स्वतः नहीं
मिलता, जबकि कथन 2 और
3 सही माने गए; मज़दूरी
भुगतान संशोधन अधिनियम 2017 बैंक खाते में
भुगतान का अधिकार देता
है।
प्र.9 |
CDS-I 2023
प्रौद्योगिकी में बदलाव या
किसी विशेष उत्पाद की माँग में
बदलाव से जो बेरोजगारी
पैदा होती है, उसे
कहते हैं:
(a) घर्षणात्मक बेरोजगारी
(b) संरचनात्मक बेरोजगारी
(c) चक्रीय बेरोजगारी
(d) प्रच्छन्न बेरोजगारी
उत्तर: (b)।
इस प्रश्न का उत्तर संरचनात्मक
बेरोजगारी दिया गया है।
प्र.10 |
UPPSC प्रीलिम्स
2025
गरीबी से संबंधित समितियों
को उनके गठन के
सही कालक्रम में रखिए:
1. लकड़ावाला समिति 2. रंगराजन
समिति 3. तेंदुलकर
समिति 4. दांडेकर
और रथ समिति
(a) 4, 1, 2, 3
(b) 1, 4, 3, 2
(c) 1, 4, 2, 3
(d) 4, 1, 3, 2
उत्तर: (d)।
दांडेकर-रथ (1970 के दशक की
शुरुआत) पहले, फिर लकड़ावाला (रिपोर्ट
1993), फिर तेंदुलकर (गठन 2005, रिपोर्ट 2009) और अंत में
रंगराजन (गठन 2012, रिपोर्ट 2014)।
निष्कर्ष
तीन बातें साथ ले जाइए। पहली, गरीबी और बेरोजगारी जुड़ी हैं पर एक नहीं हैं, और "काम करने वाले गरीब" इसका सबसे मज़बूत सबूत हैं। दूसरी, हर आँकड़े के साथ स्रोत, अवधि और तरीक़ा लिखिए, क्योंकि 5.0% और 3.2% दोनों सही हो सकते हैं। तीसरी, योजनाओं की सूची नहीं, उनकी सीमाएँ याद रखिए, क्योंकि आलोचनात्मक मूल्यांकन ही उत्तर को औसत से अलग करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गरीबी और बेरोजगारी में क्या संबंध है?
दोनों एक-दूसरे को मज़बूत करती हैं: बेरोजगारी से आय और मानव पूँजी घटती है, और गरीबी रोज़गार तक पहुँच रोकती है। पर भारत में कई गरीब काम करने वाले हैं और कई बेरोजगार गरीब नहीं हैं, इसलिए संबंध सीधा नहीं है।
भारत
में गरीबी रेखा कैसे तय होती है?
पहले कैलोरी (ग्रामीण 2400, शहरी 2100) के आधार पर तय होती थी। तेंदुलकर समिति ने उपभोग की टोकरी अपनाई और रंगराजन समिति ने उसमें न्यूनतम खाद्य-पोषण और गैर-खाद्य खर्च जोड़कर रेखा ऊँची की।
बेरोजगारी
के कितने प्रकार हैं?
प्रमुख प्रकार आठ हैं: प्रच्छन्न, मौसमी, संरचनात्मक, घर्षणात्मक, चक्रीय, तकनीकी, शिक्षित बेरोजगारी और अल्प-रोजगार। भारत में प्रच्छन्न, मौसमी और संरचनात्मक सबसे हावी हैं।
प्रच्छन्न
बेरोजगारी क्या है?
जब ज़रूरत से ज़्यादा लोग एक ही काम में लगे हों और कुछ को हटाने से भी उत्पादन न घटे, यानी उनकी सीमांत उत्पादकता शून्य हो। छोटी जोत वाली खेती इसका सबसे आम उदाहरण है।
MPI और
गरीबी रेखा में क्या अंतर है?
गरीबी रेखा आय या उपभोग-खर्च देखती है। MPI स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर की एक साथ वंचनाएँ गिनता है, इसलिए दोनों के आँकड़े अलग आते हैं।
गरीबी
उन्मूलन और रोज़गार के लिए प्रमुख योजनाएँ कौन-सी हैं?
VB-G RAM G Act, 2025 (मनरेगा की जगह), PM विकसित भारत रोज़गार योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, DAY-NRLM, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुद्रा और PM स्वनिधि।
